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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

काहे होत अधीर

काहे होत अधीर
हड़बड़ी या जल्द्वाजी में काम करना मानवीय अवगुण है। यह अक्सर बने काम को भी बिगाड़ देता है। कहा भी गया है कि जल्दी काम शैतान का। कई बार यह लाभ को हानि, सफलता को विफलता में बदल देता है। इसके विपरीत धैर्य से किए गए काम टिकाऊ माने जाते हैं।  आज की दुनिया तेज़ गति की दीवानी  भले हो, लेकिन इस हड़बड़ी ने लोगों का चैन छिन लिया है और इसने अनेक रोगों को जन्म दिया है। हड़बड़ी पूरे जीवन क्रम को अस्त-व्यस्त ही नहीं कर देती, बल्कि परिवार और समाज में भी अव्यवस्था का कारण बनती है। हमारा मन-मस्तिष्क बेचैन हो जाता है। जो हमारे स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। अधीरता अशांति कि जननी है। हर समय दौड़-धूप, हर काम में उतावलापन और अधीरता ने मनुष्य के मस्तिष्क को खोखला कर दिया है। चिंताओं ने उसे इतना कमजोर बना दिया है कि वह छोटी-छोटी परेशानी और हानि तक का सामना करने से कतराता है। ऐसे व्यक्ति के चेहरे पर उदासी, मायूसी और घबराहट आसानी से देखी जा सकती है। योग, स्वाध्याय चिंतन-मनन वगैरह से इससे छुटकारा पाया जा सकता है। शांत-चित रहने व मधुर व्यवहार की आदत बना ली जाय, तो हड़बड़ी या उतावलेपन को भगाया जा सकता है।                       

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

बुरा जो देखन मैं चला ..........

बुरा जो देखन मैं चला ..........
इस दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं-
     1.  वे लोग जो अपनी कमियों एवं कमजोरियों से नुकसान उठाने के     बाद भी उन्हें दूर नहीं करते या सुधारते नहीं हैं। वे मूर्खों की श्रेणी में आते हैं।
     2.  वे लोग जो अपनी कमियों एवं कमजोरियों के कारण नुकसान होने पर उन्हें दूर कर लेते हैं। वे औसत श्रेणी में आते हैं। 
      3.  वैसे लोग जो दूसरों की कमियों एवं कमजोरियों से सीख लेकर अपनी कमियों एवं कमजोरियों को सुधारते हैं। ऐसे लोग विद्वानों की श्रेणी में आते हैं।
       जब हम किसी की शिकायत अन्य लोगों के सामने करते हैं, अर्थात किसी की कमियों, ग़लतियों और कमजोरियों की चर्चा अन्य लोगों के सामने करते हैं तो इससे हमारे लिए कई प्रकार से नकारात्मक वातावरण तैयार हो जाता है, जो हमारी सफलता और शांति में बाधक होता है।  
        तुलसीदास ने कहा है- "जाकी रही भावना जैसी ! प्रभु मूरख देखि तीन्ह तैसी !!"  अनुभव भी यही बताता है कि जब हम किसी की  कमियां, कमजोरियां और अवगुण देखते हैं, तो हमारा सम्बन्ध भी उन्हीं कमियों एवं कमजोरियों से हो जाता है। हमारी भावना जैसी होगी, हमारे व्यक्तित्व का विकास भी उसी के अनुरूप होगा। हम सभी जानते हैं कि हर क्रिया के समान  और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। कभी-कभी हम दूसरे के विकास को रोकने के चक्कर में उनकी कमियों और कमजोरियों को उजागर कर अपना ही नुकसान किया करते हैं। ऐसा एकबार शुरू हो जाने पर रुकता ही नहीं है और हम अपने समय और उर्जा को बर्वाद करते हैं। हमारी विकास-यात्रा ठहर जाती है और हमें असफलता ही हाथ लगती है।
             अतः हमें दूसरे की कमियों, खामियों एवं कमजोरियों को उजागर करने के बदले उससे सीख लेना एवं उसे सुधारकर अपने विकास के रास्ते को प्रशस्त करना चाहिए। इसीलिए कबीरदास कहते हैं- "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोई ! जो दिल ढूँढा आपना,मुझसे बुरा न कोई !!"    

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

तेरा मुस्कुराना ग़जब ढा गया

तेरा  मुस्कुराना ग़जब ढा गया 
एक शायर ने कहा है-
                   "हर ज़ज़्बात  को जुबां  नहीं मिलती !
                                  हर आरज़ू को दुआ नहीं मिलती!!
                     हँसते रहो दुनिया के साथ, 
                                 आंसुओं को पनाह  नहीं मिलती !!"
         जीवन में मुस्कान का बड़ा महत्व है।यह अनमोल है, मगर यह बहुत मायने रखती है। यह आपके व्यक्तित्व में चार चाँद लगाता है। यह किसी भी परेशानी में एक दोस्त की तरह हाथ बढ़ाती है। सच्ची मुस्कान हमेशा दूसरों में दोस्ती की भावना पैदा करती है। मुस्कान स्वाभाविक होनी चाहिए, बनावटी नहीं। न मुस्कुराने वाले की हालत वही होती है, जैसे बैंक बैलेंस में तो करोड़ों रूपये जमा है, पर उन्हें ज़रुरत पड़ने पर बैंक से निकालने के लिए हाथ में चेक बुक नहीं है। उर्दू शायर जफ़र गोरखपुरी कहते हैं- 
            " हद से अधिक संजीदगी, 
                                 सच पूछो तो रोग है !
              ठहाके लगाकर हंसा करो, 
                                  दुःख तो एक संजोग है !!"
मुस्कुराने से शरीर में कुछ ऐसे हार्मोन निकलते हैं, जो मनुष्य के ख़राब मूड को भी अच्छा बना देते हैं। हँसने और मुस्कुराने में थोड़ा-सा फ़र्क है।मुस्कुराना केवल मन की क्रिया है, जबकि हँसना मन और तन दोनों की। परन्तु खुलकर हँसना सबसे अच्छी क्रिया है। क्योंकि हँसने के दौरान शरीर की मांसपेशियों में कम्पन पैदा होता है, जिससे शरीर की अकड़न और खिंचाव कम हो जाता है। फिर मांसपेशियों में ऑक्सीजन का प्रवाह सुचारु हो जाता है, जो आपकी कार्यक्षमता को बढ़ाता है। साथ ही यह शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को भी पिघलाकर बाहर निकालती है। मुस्कुराने से मन में प्रसन्नता उत्पन्न होती है।
         न्यूयार्क के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जोनाथन स्विफ्ट इस बात को बड़े ही दिलचस्प ढंग से समझाते हैं कि दुनिया में तीन सबसे बड़े डॉक्टर हैं- 1. संतुलित आहार 2. शान्ति और 3. आपकी मुस्कान। अनुसंधान से स्पष्ट हो चुका है कि हँसी स्वास्थ्य के लिए  ही आवश्यक है, जितना कि भोजन। यह सबसे बड़ी दवा है। क्योंकि यह मानसिक तनाव दूर करती है और मानवीय संबंधों को सुखद बना कर आपके पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को सफल बनाती है। 
          हमारे मस्तिष्क के दो भाग होते हैं- विचार और मन। शरीर की 90 प्रतिशत उर्जा मन के लिए और 10 प्रतिशत उर्जा विचारों के लिए सुरक्षित होती है। हँसने से मन की उर्जा बढ़ती है। वस्तुतः मुस्कान में वह जादू है, जो आपकी ज़िन्दगी को ख़ुशियों से भर देती है। आपकी एक सच्ची मुस्कान लोगों को आकर्षित करती है। तो आइये, हम अपने ग्राहकों का, सामने वाले व्यक्तियों का स्वागत मुस्कराहट के साथ करें और उनका दिल जीत लें।         
    

            

बुधवार, 28 नवंबर 2012

ख़ुश रहे तू सदा ........

                                                    ख़ुश रहे तू सदा .......
एक चीनी कहावत है -  
           यदि आपको एक घंटा की ख़ुशी चाहिए, तब झपकी लीजिए !    
           एक दिन की ख़ुशी चाहिए तो पिकनिक पर जाइए !!
           एक महीने की ख़ुशी के लिए शादी कर लीजिए !
           एक साल की ख़ुशी के लिए विरासत में संपत्ति प्राप्त कीजिए
लेकिन, ज़िदगी भर की ख़ुशी के लिए अपने ग्राहक को सम्मान दीजिए... 
जयकृष्ण रजक
       आपको कितनी ख़ुशी चाहिए, विकल्प आपके सामने है। ख़ुशी तो एक नज़रिया है, एक आदत है, जो रोज़मर्रा के अनुभवों से प्राप्त होती है।काम करने का आनंद एक दर्शन से भी अधिक मूल्यवान है। हम और आप जो भी काम करते हैं, उसमें सफलता और आनंद प्राप्त करना एक अलग प्रणाली है। आप हमेशा ही अपने सहयोगियों, अधिकारियों तथा अपने जूनियर्स का हँसकर स्वागत कीजिए। डाकघर में चाहे हम जिस पद पर भी काम करें, हर रोज़ आम पब्लिक से रू -ब-रू होते हैं। जब हम उनका स्वागत एक स्वाभाविक मुस्कान के साथ के करते हैं, उन्हें नमस्कार कहते हैं, तो वे खुश हो जाते हैं। भले वे अपनी शिकायत को लेकर गुस्से में हमारे पास आते हैं, हमारे  अच्छे व्यवहार से, कुछ क्षण के लिए ही सही, अपनी शिकायत को भूल जाते हैं। और गुस्से की जगह सदाचार आ जाता है। जब उनकी शिकायत दूर हो जाती है, तो वे खुश होकर हमें धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। इस प्रकार के क्रिया-कलाप से ग्राहकों का विश्वास हमारे प्रति और डाकघर के प्रति बढ़ता जाता है। और तब हम ख़ुशी का अनुभव करते हैं तथा इसका प्रभाव ताजिंदगी बरक़रार रहती है। इसके ठीक उलट जब हम ग्राहकों का  नहीं करते, उसका कम संतोषप्रद नहीं होता है तो वे अपने गुस्से का इज़हार करते हैं, उन्हें टेंशन होता है और हमें भी। उस टेंशन में हम खुश नहीं रह सकते। तो आइये, हम डाकघर के ग्राहकों,अपने सहयोगियों, अधिकारियों एवं अपने जूनियर्स का मुस्कान के साथ स्वागत करें, उनका सम्मान करें और सदा खुश रहें।